Monday, February 24, 2014

Movement launched against anti-people law UAPA (असंवैधानिक कानून यू.ए.पी.ए. को रोकने के लिए तुरन्त सक्रिय हों)























Movement launched against anti-people law UAPA 

A meeting of the community leaders, activists and lawyers held at Hotel Kamesh Hut decided to undertake nationwide campaign to repeal the anti-people law UAPA - Unlawful Activities (Prevention) Act. To coordinate and monitor the activities, a joint platform called People’s Movement Against UAPA was announced in the meeting. Moulana Muhammed Wali Rahmani isl the chairman of the core committee of the Movement. Mr. Kamal Farooqui and Mr. Muhammed Shafi are be the convener and joint convener respectively. 


More than 50 prominent activists and leaders across the eastern part of UP in India participated in the discussion. Several well-known activists participated who have been fighting various cases of innocents implicated in false cases also attended the meeting. The meeting observed that after the repeal draconian laws namely POTA and TADA, the amended version of UAPA has become a new tool to falsely implicate innocents in cases. 



Mr.Lenin Raghuvanshi welcomed the guests and briefed about the objectives, the work plan and led the discussion. He deplored that more and more number of people is mercilessly and excessively being victimized by the misuse of UAPA across the country.



The TADA & POTA have not been actually allowed to go, as each law has been replaced by a more draconian law and we now see it in the form of UAPA. He expressed horror over the attitude of media that accuses, holds trial, propagates, convicts and punishes the accused without any base. We are on the verge of diagnosing the disease of terrorism which is prevailing in our nation’s politics, judiciary and media. It’s the upper-caste and micro-minority community which has been leading the campaign of abhorrence against Dalits, Muslims and Adivasis. The majority of those victimized by the evil law UAPA belong to these sections. He also spoke about innumerable painful incidents in which young and innocent Muslim youths were arrested, implicated in false cases, tortured and made captives for years in the name of religion.



Mr. Kamal Faruqui in his capacity as the convener of the Movement briefed an action plan for the next three months prior to Lok Sabha elections and invited suggestions of the discussants. The movement will be lobbying in national capital and in the states among political party leaders. Delegation from the core committee will visit state capitals to address the issue. Posters and pamphlets regarding UAPA will be distributed throughout the country. Nationwide post card and online petition campaign have also been planned. A massive public gathering “People’s Conference Against UAPA” is scheduled to be held in New Delhi on March 5. The action plan was approved by the meeting. It was also decided to form state committees of the People’s Movement Against UAPA.



After meeting Participants organized candle march from Kamesh Hut Hotel to Chandra Shekhar Park,Lahurabeer. Prof.Shaheena Rizavi,Mr. A. Sayeed: National President-Socialist Democratic party of India,Mr. Lal Bahadur Ram,Mr. Idrish Anasari,Mr. Mehtab Ahmed,Mr. Siddiue Hasan and Shruti Nagvanshi etc.



असंवैधानिक कानून यू.ए.पी.ए. को रोकने के लिए तुरन्त सक्रिय हों


मुम्बई पर आतंकवादी हमलों के तीन सप्ताह के बाद 15 दिसम्बर 2008 को भारत सरकार ने संसद में दो नये आतंकवाद विरोधी विधेयक प्रस्तुत किया। अगले दिन केवल एक दिन की बहस के बाद संसद ने असंवैधानिक गतिविधियाँ निरोधक कानून 1967 प्रस्तावित संशोधनों के साथ पारित करने के साथ-साथ नेशनल जाँच एजेन्सी विधेयक को भी पारित कर दिया। इस में से कोई भी विधेयक संसद में प्रस्तुत करने से पहले जनता में बहस के लिए नहीं प्रस्तुत किया गया। इन दोनो विधेयकों को सामान्य जनता और भारतीय सिविल सोसायटी की पड़ताल के बिना पारित कर दिया गया।



देश के विभिन्न भागों में लम्बे समय तक निर्दोष लोगों को जेल में रखे जाने का मूल कारण यह होता है कि आरोपियों को असंवैधानिक गतिविधियाँ निरोधक कानून के अन्तर्गत गिरफ्तार किया गया होता है। 1967 के मूल कानून में तीन बार सन् 2004 ई0, 2008 ई0, 2012ई0 में इसे अधिक से अधिक अत्याचारपूर्ण बनाने के लिए संशोधन किया गया। असंवैधानिक गतिविधियाँ निरोधक कानून के अन्तर्गत विचाराधीन आरोपियों को लम्बे समय तक ज़मानत नहीं दी जाती और अधिकतर मामलों में मुक़दमें के अन्त में इनमें से अधिकतर निर्दोष सिद्ध हो जाते हैं। इस लिए यह स्पष्ट है कि जब तक असंवैधानिक गतिविधियाँ निरोधक कानून वापस नहीं लिया जाता जेलों में बन्द निर्दोषों का दर्द जारी रहेगा।



असंवैधानिक गतिविधियाँ निरोधक कानून में किए गए संशोधनों में ऐसे अनुच्छेद सम्मिलित हैं जो पिछले आतंकवाद विरोधी कानूनों के दर्पण हैं। पिछली सरकारों ने इन कानूनों की अवधि या तो समाप्त होने दी या इनको रद्द कर दिया । चूंकि इनके कारण मानवाधिकारों के गम्भीर उल्लंघन हो रहे थे। इसलिए 1985ई0 के टाडा कानून की अवधि 1995 ई0 में समाप्त होने दी गई, जब कि सन् 2002 ई0 का पोटा कानून 2004 ई0 में रद्द कर दिया गया। इन कानूनों का बड़े पैमाने पर भारत में और अन्तर्राट्रीय स्तर पर भारतीय संविधान के प्रतिकूल होने के कारण इनकी आलोचना की गई, और इस बात पर भी आलोचना की गई कि भारत ने अन्तर्राट्रीय मानवाधिकार कानूनों की पाबन्दी का वादा कर रखा है। आतंकवाद विरोधी कारवाइयों के दौरान सरकारी एजेन्सियों के माध्यम से मानवाधिकारों के कठोर उल्लंघन का कारण टाडा और पोटा दोनो थे, जिनके अन्तर्गत मनमानी गिरफ्तारियाँ, थानों में यातनाएँ और अदालत के बाहर हत्या और बल पूर्वक नौजवानों को ग़ायब किया गया।



सरकारी आँकड़ों के अनुसार टाडा को 77,500 व्यक्तियों के विरूद्ध प्रयोग किया गया। इनमें से केवल 0.81 प्रतिशत लोगों को सज़्ाा सुनाई गई। पोटा 1031 व्यक्तियों पर लगाया गया। इनमें से केवल 13 व्यक्ति न्यायिक कारवाई के बाद दोषी पाये गये। पोटा कानून के अन्र्तगत जो मानवाधिकारों के उल्लंघन हुए उनके कारण उस समय विपक्षी दल कांग्रेस, आम चुनावों के चुनाव अभियान के दौरान इस कानून को रद्द करने का वादा करने पर विवश हुई, और जब यह दल सत्ता में आया तो तुरन्त इसे रद्द किया।



बाद में जब यू.पी.ए. की सरकार ने मौजूदा असंवैधानिक गतिविधियाँ निरोधक कानून में संशोधन प्रस्तुत किये तो वह चालाकी से पोटा में मौजूद पुलिस और सुरक्षा एजेन्सियों के मनमाने अधिकारों को दूसरी बार इसमें सम्मिलित कर रही थी। असंवैधानिक गतिविधियाँ निरोधक कानून के संशोधन वास्तव में इन अनुच्छेदों को अन्तिम संभव सीमा तक निम्न लिखित तरीकों से दुरूपयोग करने का अधिकार प्रदान करते हैः
1- मौजूदा भारतीय कानून के अन्तर्गत आतंकवाद की अस्पष्ट परिभाषा करके इसका अधिकार क्षेत्र बढ़ा दिया गया है ताकि इनमें विभिन्न प्रकार की अहिंसक राजनीतिक गतिविधि को सम्मिलित कर दिया जाये जिसमें अल्पसंख्यक और सिविल सोसायटी संगठनों की ओर से किए जाने वाले राजनीतिक विरोध प्रदर्शन सम्मिलित हैं।
2- ये संशोधन किसी संगठन को प्रतिबन्धित करने के लिए सीमित साक्ष्यों और सीमित न्यायिक पुनर्निरीक्षण के अधिकार के साथ सरकार के मौजूदा अधिकारों को बढ़ा देते हैं और प्रतिबन्धित संगठन की मात्र सदस्यता को ही अपराध घोषित करते हैं।
3- ये बिना वारण्ट के तलाशी, बरामदगी और गिरफ्तारी का अधिकार देते हैं। जिसमें अधिकार अधिक और सुरक्षात्मक अधिकार कम होते हैं। और तीसरे पक्ष को न्यायालय के आदेश के बिना सूचना देने पर विवश करते हैं।
4- बिना किसी आरोप के 180 दिनों तक हिरासत में रखने की अनुमति देते हैं जिसमें 30 दिनों की पुलिस हिरासत सम्मिलित है। और ज़मानत के विरूद्ध प्रबल संभावना प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान करते हैं।
5- आतंकवाद के अपराध की संभावना व्यक्त करते हैं जहाँ कुछ प्रकार के साक्ष्य पाये जाएँ, चाहे इसमें अपराध की नीयत स्पष्ट न होती हो।
6. राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर विशेष न्यायालय स्थापित करने का अधिकार देते हैं जिसमें कैमरे के अन्दर सुनवाई का अधिकार और गुप्त गवाह प्रयोग करने का अधिकार दिया गया है।
7. इसमें निर्धारित अन्तराल पर समीक्षा करने के लिए अनिवार्य और स्पष्ट हिदायतें मौजूद नहीं हैं, जो इसके दुरुपयोग के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करने में मददगार हो सकें।
8. निर्दोष होने का प्रमाण देने का दायित्व आरोपी पर है और यह दायित्व आरोप लगाने वाले पर नहीं।



वास्तविकता यह है कि असंवैधानिक गतिविधियाँ निरोधक कानून को अधिक अत्याचारपूर्ण बनाने के बाद भी आतंकवादी गतिविधियों की दर कम नहीं हुई है, वास्तव में आतंकवाद का खतरा इस कानून के लगातार प्रयोग और दुरुपयोग के कारण बढ़ा है।



देश में आतंकवाद विरोधी कानूनों की धाराओं और उनके प्रयोग का अनुभव यह रहा है कि यह मौलिक अधिकारों का उल्लघंन करते हैं और वंचित और अल्पसंख्यक समूहों को राष्ट्रीय धारे से अलग-थलग करते हैं। अत्याचारपूर्ण कानूनों का यह नया अवतार बड़े पैमाने पर जनजातियों और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध प्रयोग होता है। इनमें से बड़ी संख्या पूरे देश में लम्बे समय के लिए असंवैधानिक गतिविधियाँ निरोधक कानून के अन्तर्गत गिरफ्तार की जाती है और उनको उच्च स्तरीय अदालतों से भी जमानत नहीं मिलती। इसलिए कभी न करने से बेहतर है कि देर से ही करें, विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र के नागरिक खड़े हों, हाथों से हाथ मिलाएँ और निम्नलिखित माँगों के महत्व को महसूस करें।
. प्रत्येक आरोपी को उस समय तक निर्दोष समझा जाए जब तक न्यायालय में उसपर दोष सिद्ध न हो जाए।
. किसी भी आरोपी व्यक्ति को अनिर्धारित अवधि तक जेल में न रखा जाए।
. जमानत देना नियमित सिद्धान्त है और जेल की सजा देना अपवाद होना चाहिए।
. विचाराधीन कैदियों को जमानत पर रिहा किया जाए।
. असंवैधानिक गतिविधियों को रोका जाए।
. अत्याचार के शिकार लोगों को क्षतिपूर्ति दी जाए।
. असंवैधानिक कानून यू. ए. पी. ए. को निरस्त किया जाए।

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